
श्रीराधा-कृष्ण के भक्तों के लिए राधाष्टमी का पर्व विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष राधारानी का जन्मोत्सव 19 सितंबर को आयुष्मान और बुधादित्य योग के शुभ संयोग में मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से राधारानी की पूजा-अर्चना और व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है तथा अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है।
मान्यता है कि जिन लोगों के इष्टदेव श्रीराधा-कृष्ण हैं, उन्हें राधाष्टमी का व्रत श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। श्रीराधा जी को सर्वतीर्थमयी और ऐश्वर्यमयी माना गया है। भक्तों का विश्वास है कि राधारानी की कृपा से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
राधाष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर या मंदिर में विधि-विधान से श्रीराधा-कृष्ण का पूजन करें। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पूजा स्थल को पांच रंगों से सजाकर मंडप बनाया जा सकता है। मंडप के भीतर कमल यंत्र बनाकर उसके मध्य दिव्य आसन पर श्रीराधा-कृष्ण की युगल प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। पूजन के दौरान “ॐ श्रीराधाकृष्णाय नमः” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।
व्रत के दौरान इन बातों का रखें ध्यान
• मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन न करें।
• क्रोध, निंदा और अपशब्दों से बचें।
• मन, वचन और कर्म की शुद्धता का ध्यान रखें।
• अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार निराहार या फलाहार व्रत रखें।
• दिनभर श्रीराधा नाम का स्मरण करें।
• अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान दें।
• गोशाला में जाकर गौसेवा करना भी धार्मिक रूप से पुण्यकारी माना जाता है।
